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Friday, June 24, 2016

उड़ता पंजाब 

‘उड़ता पंजाब’ उस अंतर्द्वंद की कहानी है जो पंजाब पर गर्व करने वाले हर पंजाबी और हिन्दुस्तानी के अन्दर होनी चाहिये. संगीत से लेकर खेत तक और देश के लिए गोल से लेकर गोली मारने तक पहला नाम पंजाब ही है. कोई आश्चर्य नहीं की वन्दे मातरम् के बाद हौसला अफजाई का दूसरा नारा ‘चक दे इंडिया’ है.
फिल्म से पहलाज निहलानी को क्या परेशानी थी ये बात समझी जा सकती है, हालाँकि माफिया और राजनेताओं के गठजोड़ को दिखाना पिछले 40 सालों से हिंदी फिल्मों का एक अभिन्न अंग रहा है. गाने ना हों ये संभव है लेकिन नेता और पुलिस भ्रष्ट ना हो ये असंभव जितना ही संभव है. लेकिन इस बार मामला इतना सीधा नहीं है. पंजाब के चुनाव और फिल्म में सबसे गंभीर समस्या का चुनाव, फिल्म को कुछ लोगो के आँख की किरकिरी बना दे ये संभव था.

फिल्म में दी जाने वाली गालिओं को निशाना बनाया जा सकता है लेकिन ‘ओंकारा’ और ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के रिलीज़ हो जाने के बाद मानक बदल जाने चाहिए थे. पंजाबी में दी जाने वाली गालियां एक तरीके से भाषा का एक हिस्सा भी हो चुकी हैं खासकर जब एक विशेष तबका उसका उपयोग कर रहा हो, इसलिए गालियों वाले संवाद ज़्यादातर खटकते नहीं है.
निश्चित तौर से निर्देशक नशे की भयावहता और इसकी चपेट में आते पंजाब को दिखाने में सफल रहे है. इस तरह की समस्याओं का पूरा ठीकरा पाकिस्तान के सर फोड़ कर आसानी से फिर देशभक्ति की वही बयार बहाई जा सकती थी जिसमें पंजाबी सैनिक मात्रभूमि के लिए कुर्बानी दे रहे हो. लेकिन ऐसी ही कई समस्याओं में हमारा अन्दर से कितना हाथ और जिम्मेदारी है ये दिखाना निर्देशक की सबसे बड़ी सफलता है.
हालांकि फिल्म में एक बिखराव है जो धीरे-धीरे एकजुट होता है और फिल्म को बांधता है. मुख्य किरदारों में टॉमी सिंह (शाहिद कपूर) वही रॉक स्टार हैं जो दुनिया की किसी भी ख़ुशी को वोदका और डोप-शोप के बिना अधूरा समझते हैं बल्कि यूँ कहे की डोप-शोप ही खुशी है और यही इनके गानों का आधार है. 
बिना नाम वाली बिहारी लड़की के पात्र में आलिया भट्ट ने कुछ ऐसा किया है जो पहले मुख्य-धरा के व्यावसायिक सिनेमा में किसी भी अभिनेत्री ने नहीं किया है. हालांकि एक पात्र की तरह दिखने के लिए अपने अन्दर वैसा ही बदलाव करना अभिनय की बिलकुल शुरूआती शर्तों में से एक होना चाहिए लेकिन मेकअप ना करने के नाम पर सिर्फ बिंदी ना लगाने वाली अभिनेत्रियों के लिए आलिया एक उदाहरण होनी चाहिए. वो अभी युवा हैं और इस समय पर खूबसूरत और ग्लैमरस ना दिखने के जोख़िम उठाने की प्रसंशा होनी चाहिए. अलिया की उपस्थिति की वजह से करीना और बासी लगती है बल्कि हम असलियत नहीं बल्कि फिल्म ही देख रहे है, इस अहसास के लिए करीना कपूर काफी है.
दिलजीत दोसांझ का उल्लेख भी जरूरी है, जो वो बने हैं वही लगते हैं.

निश्चित तौर से सेंसर बोर्ड के कारनामों ने इस फिल्म के हक़ में भी हवा बनायी है. अच्छा ही है कि लोग इस फिल्म को आने वाले चुनाव के परिपेक्ष में ही देखे. पंजाब से बाहर रहने वाले लोग अपने पंजाब की चिंता कर सकते हैं और पंजाब में रहने वाले लोग अपने पंजाब को एक नयी दिशा दे सकते हैं.
एक बात और शायद हिंदी फिल्म में गैर यूपी-बिहार के पृष्ठभूमि से आने वाली अभिनेत्री के लिए ये पहला मौक़ा होगा जब भाषा का विशेष ध्यान रखा गया है और आलिया ने बखूबी निभाया है.
फिल्म के ट्रेलर में बिहारी लड़की के मूंह से ‘सियापा’ सुनकर जो अटपटा लग रहा था, उसका भी ध्यान रखा गया है.

Friday, June 28, 2013

R D Burman : सौ सुनार की एक लोहार की







RD Burman ने सैकड़ों की संख्या में सुपर हिट संगीत दिया जो शायद कभी भी बाज़ार से बाहर नहीं होंगे। बर्मन के बाद आये सभी संगीतकारों में उनकी झलक मिलती है। विशाल भारद्वाज ने कहा था की उनको सारी मेहनत इस बात में करनी पड़ती है की उनका संगीत आर डी बर्मन का ना लगे। 
लेकिन 80 के दशक में उनकी छवि फीकी पड़ने लगी।  नासिर हुसैन जैसे साथी, जिन्होंने हमेशा ही आर डी के साथ काम किया था, वो भी अच्छा संगीत कही और तलाश कर रहे थे। सुभाष घई ने तो बर्मन को फिल्म (राम-लखन) में लेकर संगीतकार बदल दिया।
इज़ाज़त (1986) के गाने तो लोकप्रिय हुए लेकिन एक ख़ास वर्ग में, राष्ट्रीय पुरष्कार भी मिला तो गायिका आशा भोसले और गीतकार गुलज़ार को, बर्मन को नहीं।
नाकामियों और हताशा के बीच विनोद चोपडा 1942 A Love Story (1994) लेके आये। 

फिल्म का संगीत बनाने के दौरान आर डी बर्मन का खोया हुआ आत्म विश्वास इस क्लिप में देखा जा सकता है।

जावेद अख्तर ने बर्मन के लिए कहा "चैम्पियन वही है जो हारते हुए भी नॉक-आउट पंच मार सकता हो।"

और ये पंच आर डी ने मारा 1942 A Love Story (1994) में। 

Wednesday, June 26, 2013

काँस का सच





फ़िल्मी दुनिया में ऑस्कर अवार्ड्स भले ही सभी के लिए सबसे ज्यादा मान्यता रखते हो लेकिन भारत में अवार्ड्स से जुड़े जिस विदेशी event की सबसे ज्यादा चर्चा होती है वो है काँस फिल्म फेस्टिवल। और इसकी वजह है इस फिल्म फेस्टिवल में भारतीय कलाकारों की उपस्थिति। लेकिन उपस्थिति अब भीड़ में तब्दील होती जा रही है। क्या वजह कि  शर्लिन चोपड़ा और अमीषा पटेल जैसी अभिनेत्रियाँ रेड कारपेट पर चल रही है जिनकी पिछली कौन सी फिल्म चली थी याद भी नहीं। आखिरकार वे कौन से फोटोग्राफर है जिनको सारी दुनिया से आये हुए बड़े बड़े नामों के बीच शर्लिन चोपड़ा की फोटो खींचने का वक़्त मिल जाता है।

खैर हंसते और मुस्कुराते चेहरों के साथ काँस फिल्म फेस्टिवल 15 मई को शुरू हो चुका है। इधर भारत में मीडिया ये बताने में जुटा हुआ है कि कौन फेस्टिवल में जा रहा है कौन जा चुका है और कौन आखिरी वक़्त में नही जा रहा है।    तो एक बार फिर ऑफिसियल सिलेक्शन (In Competition) जिसमे 20 फिल्में सेलेक्ट होती है, इसमे भारत की एक भी फिल्म नहीं है।

खैर अगर बाज़ार की बात की जाए तो काँस मार्केट में एशिया की उपस्तिथि सबसे ज्यादा है, जिसमे भारत चीन और जापानी फिल्में है। लेकिन सच वही नहीं है जो दिख रहा है।
Cannes Market topper Jerome Paillard said “I’ve been hearing from producers looking to work on Indian projects that there’s a new generation of auteurs there who are not interested in making Bollywood movies, and who actually have a shot at being commercially successful outside of India,”

भारत की सारी उपस्थिति चमक दमक में दिख रही है। जहा तक फिल्मों के ऑफिसियल सेलेक्शन का सवाल है, किसी भी भारतीय फिल्म को स्थान नहीं मिला है 1994 के बाद। तो फिर कौन सी श्रेणी और कहा ये इतनी सारी भारतीय फिल्मे दिखाई जाती है।
"Bollywood has been at Cannes for at least a decade. But nothing much has happened yet,” Rajinder Dudrah, Senior lecturer in Screen Studies at the University of Manchester, told The Diplomat. “But lots of endorsements have taken place off the red carpet as I’m sure they will this year too."

The Cannes Film Festival is organised in various sections and category.

The Official Selection – The main event of the festival.

Parallel Sections – These are non-competitive programmes

Other Sections – Produced by outside organizations during the Cannes Festival. और इस other section में market भी आता है जहां आप पैसे देकर अपनी किसी भी फिल्म को दिखा सकते हैं।
अमिताभ बच्चन "great Gatsby" की टीम के साथ मौजूद हैं। अमिताभ बच्चन ने कांस के मंच से हिंदी में संबोधित किया उसके बाद डी कैप्रियो के साथ 66th Cannes Film Festival के शुरुआत करने की घोषणा। इधर ऐश्वर्या, सोनम के साथ शर्लिन चोपड़ा, मल्लिका शेरावत और अमीषा पटेल भी हैं। दरअसल सारा खेल फेस्टिवल के प्रायोजक कंपनियों का अपने ब्रांड Ambassadors को फेस्टिवल में बुलाना है और कुछ के लिए पैसा देकर रेड-कारपेट पर फोटो खींचा कर भारत में हर जगह छपवाना भी होता है।
तो एक बार फिर ऑफिसियल सिलेक्शन (In Competition) जिसमे 20 फिल्में सेलेक्ट होती है, इसमे भारत की एक भी फिल्म नहीं है। पिछले करीब साठ सालों में जो भारतीय फिल्में विभिन्न section में अवार्ड जीत पायी हैं वे हैं।

"Neecha Nagar" (Dir: Chetan Anand, 1946),
"Amar Bhoopali" (Dir: Rajaram Vankudre Shantaram, 1951),
"Do Bigha Zamin" (Dir: Bimal Roy, 1954),
"Pather Panchali" (Dir: Satyajit Ray, 1955),
"Kharij" (Dir: Mrinal Sen, 1982),
"Salaam Bombay!" (Dir: Mira Nair, 1988),
"Marana Simhasanam" (Dir: Murali Nair, 1999).


उधर मार्किट सेक्शन में अमीषा पटेल अपनी फिल्म Shortcut Romeo लेकर पहुंची हुई हैं, और शर्लिन चोपड़ा अपनी फिल्म को promote करने पहुंची है और फोटो ट्विटर के माध्यम से वापस भेज रही है। अफ़सोस के Kamasutra 3D का पोस्टर 100 इयर्स ऑफ़ इंडियन सिनेमा को सेलिब्रेट करने का दवा कर रहा है, वही Bombay टाल्कीस के चारों directors जोया, करन जौहर, दिबाकर बनर्जी और अनराग कश्यप रेड-कारपेट पैर चलने को तैयार हैं और एक नए भारतीय सिनेमा को दुनिया के सामने रख रहे हैं।
“There are a lot of directors who started directing movies in the early 2000s,” Banerjee said. “They kind of took mainstream Bollywood films, big sets, stars and narratives and gave them a very new tilt which reflects the urban India of today.”

दरअसल भारत का सिनेमा दुनिया भर में देखा और पसंद किया जा रहा है. लेकिन भारतीय फिल्म जिस तरह cannes को अपने प्रचार का माध्यम बना रही है उसमे बहुत सा सच सामने नहीं आ पाता. जरूरत है ये समझने की कौन किस लिए और क्या कर रहा है कांस में।

Monday, June 10, 2013

अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी का शादी के बाद का पहला इंटरव्यू



अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी का शादी के बाद दिया पहला इंटरव्यू, जो उन्होंने बीबीसी रेडियो को लन्दन में दिया।




Sunday, January 27, 2013

सिनेमा चालीसा


पहला सवाल तो ये कि गणतंत्र दिवस के 65वीं सालगिरह पर सारे टीवी समाचार चैनल, सिनेमा के 65 साल क्यों दिखा रहे थे??  खैर टीवी के विषय में ज्यादा सवाल करना खुद के सोचने और समझने की शक्ती पर सवाल खड़ा कर सकता है।

इसी सन्दर्भ में  सिनेमा के 60 साल पूरे होने पर एक पाठक वीरेन्द्र सिंह ने हनुमान चालीसा के तर्ज़ पर सिनेमा चालीसा लिखी (फिल्म पत्रिका माधुरी में)। आज 40 साल के बाद सौ साल पूरे होने पर इस रचना में और कितने नाम जोड़े जा सकते हैं?




       
दोहा:        सहगल चरण स्पर्श करनित्य करूँ मधुपान
सुमिरौं प्रतिपल बिमल दा निर्देशन के प्राण
स्वयं को काबिल मानि कैसुमिरौ शांताराम
ख्याति प्राप्त अतुलित करूँदेहु फिलम में काम

चौपाई:     जय जय श्री रामानंद सागरसत्यजीत संसार उजागर
दारासिंग अतुलित बलधामारंधावा जेहि भ्राता नामा
दिलीप 'संघर्षमें बन बजरंगीप्यार करै वैजयंती संगी
मृदुल कंठ के धनी मुकेशाविजय आनंद के कुंचित केशा।

विद्यावान गुनी अति जौहर, 'बांगला देशदिखाए जौहर
हेलन सुंदर नृत्य दिखावालता कर्णप्रिय गीत सुनावा
हृषीकेश 'आनंदमनावेंफिल्मफेयर अवार्ड ले जाएं
राजेश पावैं बहुत बड़ाईबच्चन की वैल्यू बढ़ जाई

बेदी 'दस्तकफिलम बनावेंपबलिक से ताली पिटवावें
पृथ्वीराज नाटक चलवानाराज कपूर को सब जग जाना
शम्मी तुम कपिदल के राजातिरछे रोल सकल तुम साजा
हार्कनेस रोड शशि बिराजेंवाम अंग जैनीफर छाजें

अमरोही बनायें 'पाकीजा', लाभ करोड़ों का है कीजा
मनोज कुमार 'उपकारबनाईनोट बटोर ख्याति अति पाई
प्राण जो तेज दिखावहिं आपैंदर्शक सभी हांक ते कांपै
नासैं दुख हरैं सब पीड़ापरदे पर महमूद जस बीरा

आगा जी फुलझड़ी छुड़ावैंमुकरीओम कहकहे लगावैं
जुवतियों में परताप तुम्हारादेव आनंद जगत उजियारा
तुमहिं अशोक कला रखवारेकिशोर कुमार संगित दुलारे
राहुल बर्मन नाम कमावें, 'दम मारो दममस्त बनावें


नौशादहिं मन को अति भावेंशास्त्रीय संगीत सुनावें
रफी कंठ मृदु तुम्हरे पासासादर तुम संगित के दासा
भूत पिशाच निकट पर्दे पर आवेंआदर्शहिं जब फिल्म बनावें
जीवन नारद रोल सुहाएंदुर्गाअचला मा बन जाएं

संकट हटे मिटे सब पीड़ाकाम देहु बलदेव चोपड़ा
जय जय जय संजीव गुसाईंहम बन जाएं आपकी नाईं
हीरो बनना चाहे जोई, 'फिल्म चालीसापढ़िबो सोई
एक फिलम जब जुबली करहींमानव जनम सफल तब करहीं

बंगला कारचेरि अरु चेरा, 'फैन मेलकाला धन ढेरा
अच्छे-अच्छे भोजन जीमैंनित प्रति बढ़िया दारू पीवैं
बंबई बसहिं फिल्म भक्त कहाईअंत काल हालीवुड जाई
मर्लिन मनरो हत्या करईंतेहि समाधि जा माला धरईं

      दोहा:           बहु बिधि साज सिंगार करपहिन वस्त्र रंगीन
राखीहेमासाधनाहृदय बसहु तुम तीन
                                  (वीरेन्द्र सिंह गोधरा, 15 सितंबर 1972.)

बोल इन्द्रा बोल







सिनेमा के सौ साल, मंहगाई, भ्रष्टाचार, कांग्रेस की सरकार  इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए, हिंदी सिनेपत्रिका "माधुरी" में 1967 में छपी एक परोडी आज भी प्रासंगिक है।



इतना महँगा गेहूँऔ इतना महँगा चावल
बोल इन्द्रा बोल सस्ता होगा कि नहीं

कितने घंटे बीत गए हैं मुझको राशन लाने में
साहब से फटकार पड़ेगी देर से दफ़्तर आने मे
इन झगड़ों का अन्त कहीं पर होगा कि नहीं॥ बोल इन्द्रा बोल...

दो पाटों के बीच अगर गेहूँ आटा बन जाता है
क्यों न जहाँ पर इतने कर होंदम सबका घुट जाता है
कभी करों का यह बोझा कम होगा कि नहीं।। बोल इन्द्रा बोल...

हम जीने को तड़प रहे ज्यों बकरा बूचड़ख़ाने में
एक नया कर और लगा दो साँस के आने-जाने में
आधी जनता मरे चैन तब होगा कि नहींबोल इन्द्रा बोल...

                                    माधुरी (22 सितंबर 1967).

Sunday, January 20, 2013

Matru Ki Bijlee Ka Mandola




विशाल भारद्वाज एक बड़े फिल्मकार हैं, और उनकी फिल्मों को देख कर लग रहा है कि जिस कैनवास और मुद्दे कि फिल्म वो बनाना चाह रहे हैं उसके लिए उनकी २ फिल्मों के बीच शायद और ज्यादा वक्त दरकार है
जहां तक कलात्मक स्वतन्त्रता का सवाल है उसकी हद इस बात पर निर्भर करती है कि आप ने इस स्वतन्त्रता का किया क्या? अफ़सोस विशाल ज्यादा कुछ नहीं कर पाए
नेता, पुलिस, अपराधी और उद्योगपतियों का जमावडा कितना घातक हो सकता है, बात यही थी ऐसी बातें हलके फुल्के अंदाज़ में की जाए तभी इसका असर होता है यहाँ तक विशाल का अंदाज़ सही था लेकिन अंदाज़ इतना भी हल्का नहीं होना चाहिए की फिल्म का फुल्का बन के रह जाए
मटरू (इमरान खान) मंडोला का ड्राईवर है और मंडोला की लड़की है बिजली (अनुष्का शर्मा) मंडोला प्रदेश की मुख्यमंत्री देवी (शबाना आज़मी) के साथ सांठ गाँठ करके गाँव के इकोनोमिक जोन वाली ज़मीन पर अपनी फैक्ट्री खोलना चाहता है मंडोला एक शराबी है जो शराब के नशे में एक उदार दिल इंसान बन जाता है और अपने ही खिलाफ गाँव वालो को भड़काता है  
मिलने वाली जायदाद को देखते हुए देवी अपने बेटे बादल (आर्य बब्बर) की शादी बिजली से कराना चाहती है जिसमे मंडोला का भी राजनैतिक फायदा है
इस राजनैतिक खेल में गाँव वालो की ज़मीन हथियाई जा रही है जिसको रोकने के
लिए गाँववालों के साथ माओ है बाज़ी कभी सरकार और कभी गाँव वालो के तरफ आती जाती है
 
अभिषेक चौबे और विशाल भारद्वाज पठकथा लिखने में शायद इस बात पर मात खा गए की फिल्म को किस हद तक गंभीर रखा जाए और किस हद तक कॉमेडी लेकिन गंभीर मुद्दों को कोमेडी में पिरोने का प्रयास सराहनीय था हालांकि फिल्म १९४० के एक नाटक Mr Puntila and his Man Matti से काफी प्रभावित लगती है लेकिन इसमे अभिषेक और विशाल ने अपने रंग भरे हैं
जहां तक निर्देशन का सवाल है विशाल अपने तरह के अकेले ही निर्देशक हैं और वो बतौर निर्देशक अपने स्तर का अहसास करा ही देते हैं हालांकि इस बार हरियाणा की प्रष्ठभूमि थी लेकिन उन्होंने संवादों को गालियों से बचाया और साथ साथ शब्दों का बड़ा ही अच्छा उपयोग भी किया है जैसे भाग झोपड़े से आंधी आयी
बतौर संगीत निर्देशक विशाल भारद्वाज ने कई रंग भरे हैं, गीत के बोल सुनकर ही पहचाना जा सकता है की ये काम गुलज़ार का है
कार्तिक विजय की सिनेमेटोग्राफी एवं श्रीकर प्रसाद की एडिटिंग अच्छी है


अभिनय की द्रष्टि से फिल्म पूरी तरह पंकज कपूर के ही इर्द गिर्द घूमती है, पंकज कपूर ने अच्छा अभिनय किया है और इससे कम की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है शबाना आज़मी ने अपनी स्तर का काम किया है और एक दो दृश्यों में उन्होंने कमाल ही किया है लेकिन ये कहना होगा की इमरान खान का ये अभी तक का सबसे उम्दा अभिनय है विशाल ने ये बात का ख्याल बराबर रखा है की इमरान को कितनी ढील देनी है अनुष्का अपने कम्फर्ट ज़ोन में हैं,  उन्होंने जो पहली फिल्म में किया था, और जो पिछली फिल्म में किया था, और जो इन दोनों फिल्मों के बीच में किया था, वही उन्होंने इस फिल्म में भी किया है।  अभी तक उनके अभिनय में कोई दूसरा रंग देखने को नहीं मिला है आर्या बब्बर भी फिल्म में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं
फिल्म एक बार देखे जाने के काबिल है और हर किसी के लिए नहीं है इस बात का भी सुकून है की विशाल जैसे निर्देशक आज भी सौ करोड के रेस में नहीं हैं इसलिए अच्छी फिल्मों की उम्मीद बराबर की जा सकती है
एक आखिरी सवाल कही फिल्म ये तो नहीं कहती कि माओ सचमुच किसानो का दोस्त है??
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Thursday, January 3, 2013

सेलेब्रिटी होने की ज़िम्मेदारी



सेलेब्रिटी होने की ज़िम्मेदारी 






दिल्ली में हुई बलात्कार की घटना ने आम-जनमानस  को भी झकझोर के रख दिया। आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हुआ और चल रहा है। अच्छी  बात ये है की एक बहस शुरू हुई है, और होती रहनी चाहिए।
हमारे फ़िल्मी सितारे भी आवाज़ उठाने में पीछे नहीं रहे। फिर चाहे दोषियों को सज़ा दिलवाना, कानून में बदलाव, सरकार की भूमिका और पुलिस के रवैय्ये हर बात पर बात। खूब बात।
लेकिन फ़िल्मी सितारों को सबसे पहले अपने हिस्से के काम को अंजाम देना चाहिए। और वो है फिल्मों में महिलाओं की स्थिति। भारत में महिलाओं के माजूदा बर्ताव को सही मनवाने के सबसे ज्यादा क्रेडिट फिल्मों को ही मिलवाना चाहिए।
आदर्श भारतीय नारी की तथाकथित परिभाषा आम जनता तक फिल्मों ने ही पहुंचाई है।
औरतों को भोग की वस्तु की तरह परोसे जाने में आला दर्जे की अभिनेत्रियों का भी हाँथ है। आखिरकार कौन सी मजबूरी करीना कपूर और कटरीना कैफ को आईटम नंबर करवाता है। हालत ये है की जिस वक़्त लोग कैंडल लिए सड़कों पर घूम रहे है, सलमान साहब दोषियों को फांसी की वकालत कर रहे हैं वही दबंग में वो मिस काल से "लौंडिया  पटाने" की बहादुरी दिखा रहे हैं। हनी सिंह खुल्लम खुल्ला समाज की शालीनता के साथ बलात्कार कर रहे हैं।
अमिताभ बच्चन काफी आहत हैं। पुलिस पर ऊंगली उठाने वाले अमिताभ ने खुद पुलिस बन कर क्या नसीहत दी ये हम देख सकते है। देखे अमिताभ साहब अपने इस प्रवचन पर दूसरी लाइन क्या कहते हैं।
पहली लाइन :- हम तो निर्देशक के हाँथ की कठपुतली हैं।

Sunday, December 23, 2012

DABANGG 2




एक डॉलर के अगर 50 रूपए मिलते हों फिर भी 51 रूपए एक डॉलर से ज्यादा होंगे । कहने का मतलब ये है की अगर आप चाहते हैं कि आपकी फिल्म डॉलर से भी ज्यादा कमाई करे तो फिर सिनेमा, सिंगल स्क्रीन जाने वाले दर्शकों के लिए ही बनाना होगा वो भी चुलबुल पांडे (सलमान खान) के साथ।


एक फिल्म की कहानी लिखना शायद कम मेहनत का काम होगा बनिस्पत किसी दबंग जैसी फिल्म में कहानी ढूँढना। चुलबुल पांडे का तबादला लाल गंज से कानपुर हो चुका है। अब दबंग पांडे-2 सबकुछ वैसा ही करेंगे जैसा उन्होंने दबंग में किया था। अगर पिछली 2 लाईन्स को आप कहानी मानने को तैयार हैं तो बस यही है कहानी।

फिल्म की पठकथा और निर्देशन के विषय में ये कहा जा सकता है कि, ऐसा कुछ समझने के लिए आप को पास के सिंगल स्क्रीन थियेटर जाना होगा, और दुसरा ये कि जिस टैक्सी से मैं थियेटर गया उस टैक्सी वाले ने फिल्म मुझसे पहले ही देख रखी थी। उसका कहना है कि साहब .. हीरो है तो बस "भाई"।

मुझे ये जानना था की अरबाज़ के निर्देशन में और भी कुछ ख़ास बात है क्या? इसका जवाब मिला थियेटर के बाहर एक पान की दूकान पर। पान वाले ने बताया कि "भाई अकेला हीरो है जिसके फिलम में, बोले तो टिकिट खिड़की पर आज भी पुलिस लगता है"।

सलमान की फिल्मों में एक्शन टिकिट खिडकी से शुरू होता है और परदे पर ढाई घंटे चलता है। 

निर्देशक निर्माता और पांडे जी तीनो लोग इस बात को समझ चुके हैं कि दूसरा रजनीकांत दक्षिण में नही तो मुंबई में तो बनाया ही जा सकता है। माफ़ कीजिये .. बन चुका है।

ना जाने कब तक हम पांडे जी कि फिल्मों की तारीफ़ में ये कहते रहेंगे कि "फिल्म मनोरंजक है लेकिन दिमाग घर में छोड़कर जाईये"। 

एक आखिरी गुजारिश ... "अब बस भी कीजिये पांडे जी"

Sunday, December 2, 2012

तलाश





आमिर खान का फिल्म में होना जहां फिल्म की सफलता की गारंटी बन चुका है वही आमिर की उपस्थिति से मानदंड इतने ऊंचे हो जाते हैं कि सर्वोत्तम से कम कुछ भी नहीं तलाश के साथ भी यही हुआ

तलाश कहानी है पोलीस इंस्पेक्टर शेखावत (आमिर खान) की जो अपने बेटे की मौत का खुद को जिम्मेदार समझता है और इसी अंतर्द्वंद में वो अपनी पत्नी रोशनी (रानी मुखर्जी) के साथ रह रहा है, लेकिन फिल्म कि मुख्यधारा में जो कहानी चल रही है उसमे एक फिल्मस्टार की रहस्यमय परिस्थितियों में एक कार एक्सीडेंट में मौत हो जाती है जिसकी तहकीकात में पुलिस के सामने कई राज़ खुलते जाते हैं और कहानी में रोज़ी (करीना कपूर), तैमूर (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) के साथ और भी कई पात्र आते हैं फिल्म की रोचकता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आप को फिल्म के बारे में कम से कम जानकारी हो इसलिए बेहतर है कि फिल्म के कहानी कि इससे ज्यादा बात ना कि जाए

जोया अख्तर और रीमा कागती की लिखी कहानी काफी सधी हुयी है और बराबर आपको कहानी के भीतर ही रखती है रीमा की पिछली फिल्म भी (हनीमून ट्रावेल्स) उनकी कहानी के विशेष अंत के प्रति उनकी पसंद को दर्शाती है फिल्म के संवाद जो फरहान अख्तर और अनुराग कश्यप ने लिखे हैं, एक बड़ी हिंदी फिल्म के बनाए हुए पैमाने पर तो कोई विशेष नहीं है लेकिन फिल्म की मांग भी यही थी की परदे पर आम जिंदगी जीने वाले कलाकार भारी-भरकम संवाद बोलते नज़र नहीं आने चाहिए

हालांकि आमिर के द्वारा अभिनीत फिल्म में निर्देशक की तारीफ़ करते वक्त एक असमंजस बना रहता है लेकिन फिर भी यही कहा जाएगा रीमा की ये फिल्म १९६० के दशक के बाद हिंदी में बनी सस्पेंस फिल्मों में एक बेहतरीन फिल्म है सस्पेंस फिल्मों की खासियत यही होनी चाहिए की ना सिर्फ राज़ खुलने के बाद वो सभी सवालों का जवाब दे बल्कि फिल्म शुरू से ही हमे राज़ को समझने का इशारा भी करे ये दोनों ही बातें तलाश को पिछले कुछ दशको में बनी सस्पेंस और थ्रिलर फिल्मों से अलग करती है निर्देशक ने अपने तीनो ही मुख्य पात्रों को वज़न बढाने की हिदायत दी थी, और उनका ये फैसला भी पात्रों को और आम बनाता है

फिल्म संगीत से ज्यादा बैगराउंड संगीत का महत्व है जिसके लिए रामसंपथ बिलकुल उपयुक्त हैं मुस्काने झूठी हैं गाना फिल्म की शुरुआत में है जो देखने और सुनने दोनों में ही बेहतरीन है फिल्म कि सिनेमेटोग्राफी मोहनन ने कि है जो काफी आला दर्जे की है, पानी के अंदर शूट किया गया सीन (जिसे लन्दन के एक स्टूडियो में शूट किया गया था) काफी अच्छा है

सस्पेंस फिल्मों के राज़ पता चल जाने के बाद उस फिल्म को देखना जैसे बेकार ही होता है लेकिन यहाँ राज़ के अलावा भी एक बड़ी वजह है और वो है अदाकारी अब वो चाहे आमिर के सहयोगी बने राज कुमार यादव ही क्यों ना हो अय्या जैसी फिल्मों में देखने बाद रानी को इस फिल्म में देखना सुखद है रानी ने इस फिल्म के माध्यम से बताया कि एक अच्छे कलाकार को भी खुद कि प्रतिभा दिखाने के लिए एक अच्छी फिल्म या निर्देशक की तलाश होती है करीना कपूर का अभिनय (हाव-भाव) तो ठीक है, लेकिन इस फिल्म में समझ आया की वो जो हर दूसरी फिल्म में करती हैं दरअसल उस अभिनय कि जरूरत यहाँ थी नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने बेहतरीन काम किया है लेकिन इससे कम की उम्मीद उनसे की भी नहीं जा सकती क्युकी ना सिर्फ वो अपने कम्फर्ट ज़ोन में थे बल्कि उनके पात्र और अभिनय ने सलाम बॉम्बे के रघुवीर यादव की भी याद दिला दी  
बात करे आमिर खान की तो सिर्फ यही कहा जाना चाहिए कि आमिर खान ने अभिनय में अपने बनाये मानदंड के अनुरूप ही काम किया है


सिर्फ एक टीस रह जाती है कि आमिर अगर कोई सस्पेंस फिल्म करे (२ साल के बाद), तो क्या इससे भी बेहतर कि उम्मीद करना वही होगा जैसा सचिन से हर मैच में शतक की उम्मीद करना

Monday, September 17, 2012

सुर-क्षेत्र : भारत-पाकिस्तान?


पिछले सात-आठ सालों से भारत पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच अब वो सनसनी नहीं पैदा करता जो कभी किया करता था, अब उस जगह पर आस्ट्रेलिया आ चुका है लेकिन क्या आस्ट्रेलिया ने वो मरने मारने वाली बात पैदा की?... शायद नहीं ये एक अच्छी बात है लेकिन शायद बाजार के लिए ये अच्छी बात ना हो एक दूसरे को हराने की भावना दोनों ही देशों में है लेकिन शायद पाकिस्तान में ज्यादा क्योंकी पाकिस्तान की हर बात भारत केंद्रित ही होती है, वंहा हर अच्छी और बुरी बात के लिए भारत का ही उदाहरण दिया जाता है इसी भावना की वजह से भारत-पाकिस्तान का मैच हर किसी के लिए (खिलाड़ियों के लिए भी) पैसा कमाने की गारंटी था और आज भी है एक दूसरे को हराने की भावना शायद थोड़ा कम हो गयी हो लेकिन इतनी तो हमेशा ही रहेगी, की इसका जम के फायदा उठाया जाए, और अब यही फायदा उठाने की बारी है सुर-क्षेत्र कार्यक्रम की जो कलर्स चैनल की नयी पेशकश है, इसके निर्माता है बोनी कपूर और निर्देशक हैं सारेगामा और अन्ताक्षरी वाले गजेन्द्र सिंह

मज़े की बात ये है की प्रोग्राम अमन की आशा में बनाया गया है लेकिन भुनाया वही जा रहा है जिसकी वजह से अमन नहीं है प्रोग्राम की टीआरपी इसी में है की शो के दरमियान बिलकुल भी अमन ना रहे कहने का मतलब है की दोनों देशों के बीच जो भी थोड़ा बहुत अमन है उसमे ऐसे प्रोग्राम नुकसान ही पहुंचाते हैं
एक और बात की आशा भोंसले को इस पैसा कमाने वाले खेल में अपनी गरिमा का ख्याल रखना चाहिए, क्योंकी आतिफ असलम से सुरों के लिए बहस करने में उनको बहुत नीचे उतरना होगा

अब सबसे बड़ा सवाल की अपने फायदे और पैसा कमाने के लिए किसी भी कलर्स, बोनी कपूर या गजेन्द्र सिंह को भारत के नाम का दुरूपयोग करने कि इजाज़त किसने दी? हिमेश और आतिफ की टीम का नाम भारत-पकिस्तान कैसे हो सकता है? हमारा प्रतिनिधित्व वो क्यों करे जिसे हमने चुना ही नहीं?

ये इसलिए मुमकिन है क्योंकी लोकतंत्र में रहते हुए भी, हमें आदत है बीसीसीआई की टीम को इंडिया की टीम मानने की, माल्या और अम्बानी के खरीदे हुए लोगो को बंगलौर और मुंबई कहने की, फेमिना की प्रतियोगी को मिस इंडिया कहने की, मिस वर्ल्ड मानने की, इस बात से बेखबर की उनकी जीत किस तरह का और कितना बदलाव समाज और बाज़ार में ला सकता है
हमको चुनने और हटाने का अधिकार है

राम सेठी : अमिताभ के प्यारेलाल



  
सत्तर और अस्सी के दशक में हिंदी फिल्मों के शौक़ीन और खासकर अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों के लिए प्यारेलाल एक जाना पहचाना नाम है ये वो नाम है जो अमिताभ बच्चन की प्रकाश मेहरा के साथ की गयी सभी हिट फिल्मों के साथ जुड़ा हुआ है जी हाँ और वो हैं राम सेठी। जिन्होंने पिछले चालीस सालों में अमिताभ और उस वक्त के तकरीबन सभी बड़े कलाकारों के साथ काम किया वो एक बार फिर चर्चा में आये जब उन्हें पिछले दिनों एक मोटर बाईक के विज्ञापन में देखा गया वैसे 2010 में उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की फिल्म खेलें हम जी जान से में काम किया था लेकिन वो फिल्म बुरी तरह पिटी और राम सेठी के लौटने की चर्चा हुई बाईक के विज्ञापन के साथ

७३ साल कि उम्र में राम सेठी एक बार फिर अपने फ़िल्मी सफर को शुरू करने जा रहे हैं राम सेठी के अनुसार वो १९६२ में दिल्ली से मुम्बई आये और उनके आठ भाई बहन थे उनके पिता ने उन्हें १५० रूपए महीना देने का वादा किया लेकिन सिर्फ ६ महीनो के लिए ना कुछ होना था ना हुआ और वो वापस दिल्ली गए लेकिन १९६४ में फिर आने के लिए, इस बार भी काम तो नहीं मिला लेकिन लेख टंडन (रवीना के पिता) जैसे निर्देशकों से आश्वाशन जरूर मिला १९६८ में एक बार फिर मुंबई का रुख किया और इस बार वापस ना जाने के लिए, और शुरुआत हुई एम.एस. सथ्यु (गरम हवा के निर्देशक) के सहायक के रूप में जो भारत-रूस के सहयोग से बन रही एक फिल्म ब्लैक-माउन्टेन बना रहे थे


१९७१ में राम सेठी की मुलाक़ात प्रकाश मेहरा से हुई जो एक फिल्म बनाने जा रहे थे, राम सेठी ने शुरुआत की क्लैप-बॉय के रूप में और फिल्म के लिए डायलाग भी लिखे।
राम सेठी बताते हैं कि उन दिनों राईटरस को ना सिर्फ लाइन्स को उर्दू में ही लिखना पड़ता था बल्कि उनके सही उच्चारण की जिम्मेदारी भी होती थी।

प्रकाश मेहरा कि फिल्म एक कुंवारी एक कुंवारा में सहायक निर्देशक की भूमिका के साथ अभिनय का भी मौक़ा मिला और यहाँ से राम सेठी के अभिनय का सफर शुरू हुआ। फिर उसके बाद जंजीर आई जिसमे उन्होंने एक पुलिस कान्स्टेबल का रोल अदा किया। 

और फिर आई मुकद्दर का सिकंदर, जिसमे राम सेठी ने अमिताभ बच्चन के साथ काम किया जिसने उन्हें प्यारेलाल के नाम से ही प्रसिद्ध कर दिया। दरअसल प्यारेलाल का रोल असरानी को करना था लेकिन ऐन वक्त पर असरानी किसी दूसरी फिल्म कि शूटिंग में फंस गए और दो दिल इंतज़ार के बाद रोल मिला राम सेठी को।

प्रकाश मेहरा ने राम सेठी को १९८३ में एक फिल्म घुंघरू का निर्देशन भी करने को दिया जिसमे शशि कपूर और स्मिता पाटिल जैसे कलाकार थे। 
प्रकाश मेहरा राम सेठी को नहीं छोड़ना चाहते ना राम सेठी प्रकाश मेहरा को। प्रकाश मेहरा के साथ ने जहा उन्हें काम दिलाया वहीं शायद राम सेठी बाहर मिलने वाले काम को गंवाते भी रहे।

नब्बे के दशक में राम सेठी की माली हालत ने उन्हें एक बार फिर करीब करीब फुटपाथ पर लाकर खड़ा कर दिया, यहाँ एक बार फिर प्रकाश मेहरा ने उन्हें आर्थिक मदद की। करीब चार साल तक टीवी में काम करने के बाद राम सेठी एक बार फिर अपने पुराने काम में मशगूल होते दिख रहे है। प्यारेलाल का स्वागत है।

राम सेठी कि अगली फिल्म है राजकुमार हिरानी और आमिर खान की पीके